Jul 172014
 

தமிழில் ஸ்ரீ மகா ம்ருத்யுஞ்சய கவசம் 

Shree Mahamrutyunjaya kavacham in Latin Script

भैरव उवाच :-

1. श्र्रुनुश्व परमेसनि कवचं मन्मुखोधिथं,
महा मृत्युञ्जयस्यस्य न धेयं परमध्बुथं

2. यं द्रुथ्व, यं पदिथ्व च यं स्रुथ्व कवचोथामं,
त्रिलोक्यधिपथिर भूथ्व सुखिथोस्मि महेस्वरि.

3. तदेव वर्णयिष्यामि थ्व प्रीत्या वरानने,
तदापि परमं थथ्वम् न दथव्य दुरथ्मने.

4. ॐ अस्य श्री महा मृथ्युन्जय कवचस्य,
श्री भैरव ऋषि, गयथ्री चन्द,
श्री मृत्युञ्जय रुद्रो देवथा, ॐ भीजं,
ज्रं शक्थि, स कीलकं होउं इथि थथ्वम्,
चतुर्वर्ग फल साधने पते विनियोग.

5. ॐ चन्द्र मण्डल मध्यस्थे रुद्रमले विचिथ्राथे,
ठथ्रस्थ्वम् चिन्थयेतः साध्यं मृत्युं प्रप्नोथि जीवथि.

6. ॐ ज्रं स होउं सिर पथु, देवो मृत्युञ्जयो मम,
श्री शिवो वै ललाटं च ॐ होउं ब्रोवोव् सदा शिव.

7. नीलकन्तो आवथान नेत्रे, कपर्धी मय अवथ च्छ्रुथी,
त्रिलोचनो अवथादः ग़न्दोव्, नासं मय त्रिपुरन्त्हक.

8. मुखं पीयुष घट ब्रुदः, श्तौ मय कृथिकंबर,
हनुं मय हत केसानो, मुखं बटुक भैरव.

9. कन्धरां कलमधनो, गलं गनप्रियो अवथु,
श्र्कन्धौ स्कन्द पिथ पथु, हस्थौ मय गिरेस्सोवथु.

10. नासान मय गिरिजनधा, पयाद अङ्गुली संयुधान,
श्र्थनौ थारपथि पथु वक्ष पसुपर्थिर मम.

11. कुक्षिं कुभेरवदन, पर्सौ मय मर ससन,
सर्व पथु थया नाभिं सूली पृष्टं ममव्थु.

12. सिस्नं मय संकर पथु, गुह्यं गुह्यकवल्लभा,
कटिं कलन्थक पायदः ऊरु मय अन्धक गाथाक.

13. जागरूको अवथा जानु, जङ्गे मय कला भैरव,
ग़ुल्फ़ो पयद जटाधारी,पधो मृथ्युन्जयो आवथु.

14. पधधि मूर्धा पर्यन्थं सध्योजथ ममवथु,
रक्ष हीनं नाम हीनं वपु पथ्व म्रिथेस्वर.

15. ईसन्यमीस्वर पयद अज्ञेय अं अग्नि लोचन,
नैर्यथ्यं संभू रव्यतः, मां वायव्यं वायुवाहन.

16. ओर्ध्वम् बलप्रमधन पथाले अरमेश्वर,
दस दिक्षु सदा पथु महा मृथ्युञ्जयस्च मां.

17. रणे राजकुले ध्यूथे विषमे, प्राण संशये,
पायद ॐ ज्रं महा रुद्रो, देव देवो दसक्षर.

18. प्रभाथे पथु मां ब्रह्म, मद्यःने बिरवो आवथु,
सायं सर्वेस्वर पथु, निसयां नित्य छेथन,

19. अर्ध रथेर महा देवो, निसन्थे मां महोधाय,
सर्वदा सर्वथु पथु, ॐ ज्रं स होउं मृत्युञ्जय.

20. इथीधं कवचं पूर्णं, त्रिषु लोकेषु दुर्लभं,
सर्व मन्थर मयं गुह्यं सर्व थान्थ्रेषु गोपिथं.

21. पुण्यं पुन्यप्रधं दिव्यं देव देवाधि दैवथं,
य इधं पदेन मन्थरं कवचं वचयेथ थथ.

22. थस्य हस्थे महादेवि थ्र्यंबकस्य अष्ट सिध्य,
रणे द्रुथ्व चरेदः युधां, हथ्व सथ्रून जयं लभेतः.

23. जपं क्रुथ्व गृहे देवी संप्रप्स्यथि सुखं पुन,
महा भये, महा रोगे, महा मारि भये थधा,
दुर्बिक्षे, सथृ संहारे पदेतः कवचमदरतः.

इथि रुद्र यमले, देवी रहस्ये, श्री महा मृत्युञ्जय कवचं समोथं.

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